थॉमसन द्वारा e/m का निर्धारण करना

थॉमसन द्वारा e/m का निर्धारण करना

थॉमसन द्वारा e/m का निर्धारण करना –

इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान एवं आवेश (Specific charge of electron) :-

परमाणुओं और अणुओं के रासायनिक गुणों और विद्युत् चालन में इलेक्ट्रॉनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

वास्तव में इलेक्ट्रॉन इलेक्ट्रॉनिकी (Electronics) की आत्मा है।

टेलीविजन , ट्रांजिस्टर , रेडियो , केलकुलेटर , डिजिटल घड़ियाँ आदि युक्तियों (Devices) इलेक्ट्रॉनों के चालन पर आधारित हैं।

यद्यपि इलेक्ट्रॉनों को आज तक किसी ने नहीं देखा है तथापि सर्वप्रथम जे. जे. थामसन ने विसर्जन नलिका में इलेक्ट्रॉनों के अस्तित्व का पता लगाया था।

उन्होंने इलेक्ट्रॉन के आवेश और द्रव्यमान के अनुपात (e/m) का निर्धारण किया।

आगे चलकर आर. ए. मिलिकन (R. A. Millikan 1868 – 1953) ने इलेक्ट्रॉन के आवेश e का मान ज्ञात किया।

इस प्रकार e/m और e के मान ज्ञात होने पर इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान m ज्ञात करना सम्भव हुआ।

थामसन के अध्ययनों से ज्ञात हुआ कि विभिन्न धातुओं से प्राप्त होने वाले इलेक्ट्रॉन हर दृष्टि से सर्वसम होते हैं

तथा e/m का अनुपात सदैव वही रहता है।

इलेक्टॉन का द्रव्यमान 9.1 × 10⁻³¹ किग्रा तथा आवेश – 1.6 × 10⁻¹⁹ कूलॉम होता है।

इलेक्टॉन का विशिष्ट आवेश (Specific Charge of Electron) :-

किसी आवेशित कण के आवेश और द्रव्यमान के अनुपात को उस आवेशित क्रम का विशिष्ट आवेश कहते हैं।

सूत्र रूप में ,

विशिष्ट आवेश = आवेश / द्रव्यमान

इलेक्टॉन के लिए –

विशिष्ट आवेश = e/m = 1.6 × 10⁻¹⁹ / 9.1 × 10⁻³¹ किग्रा।

विशिष्ट आवेश = 1.76 × 10¹¹ कूलॉम / किग्रा

(नोट :- सन् 1905 में फिलिप लेनार्ड (जर्मन 1842-1919) को कैथोड किरणों के अध्ययन के लिए एवं सन् 1906 में जोसेफ जॉन थामसन (ब्रिटिश 1856-1905) को इलेक्टॉन की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।)

इलेक्ट्रॉन के विशिष्ट आवेश (e/m) का निर्धारण (Determination of Specific charge (e/m) of the Electron) :-

सर्वप्रथम सन् 1897 में जे. जे. थामसन ( J. J. Thomson ) ने इलेक्ट्रॉन के विशिष्ट आवेश (अर्थात इलेक्ट्रॉन के आवेश और द्रव्यमान का अनुपात = e /m ) का मान ज्ञात किया था।

उनका प्रयोग निम्न तथ्यों पर आधारित है:

1. गतिमान इलेक्ट्रॉन विद्युत धारा के समतुल्य होते हैं।

2. इलेक्ट्रॉन आवेशित कण होते हैं। अतः विद्युत क्षेत्र और चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा विक्षेपित किये जा सकते हैं।

प्रायोगिक प्रबंध (Experimental Arrangement) :-

चित्र में दर्शाये अनुसार एक विसर्जन नलिका होती है जिसके अंदर भरी गैस का दाब 0.01 मिमी (पारा) होता है।

इसके कैथोड C और ऐनोड A के मध्य उच्च विभवान्तर (10kV से 15kV के क्रम का ) लगाया जाता है।

कैथोड C का तल समतल होता है , किन्तु ऐनोड A बेलनाकार होता है

जिसके अन्दर बारीक छिद्र बना होता है।

इस छिद्र से इलेक्ट्रॉन बारीक पुँज के रूप में बाहर निकलने हैं।

यह पुँज एक समान वेग में सरल रेखा में चलकर प्रतिदीप्तिशील पर्दा SS’ पर टकराता है।

फलस्वरूप पर्दे के बिन्दु के बिन्दु P पर एक चमकीला धब्बा प्राप्त होता है।

नलिका के अंदर धातु की दो समान्तर प्लेटें X और Y होती हैं

जिसके मध्य विद्युत विभवान्तर लगाकर कागज के तल में विद्युत क्षेत्र उत्पन्न किया जा सकता है।

यह क्षेत्र इलेक्ट्रॉन पुँज के मार्ग के लम्बवत् होता है।

एक विद्युत चुम्बक की सहायता से विद्युत क्षेत्र और इलेक्ट्रॉन पुँज दोनों के लम्बवत् चुम्बकीय क्षेत्र लगया जाता है।

यह चुम्बकीय क्षेत्र कागज के तल के लम्बवत् होता है।

चुम्बकीय क्षेत्र को चित्र में बिन्दुवार से प्रदर्शित किया गया है।

ध्यान रहे कि विद्युत बल रेखाएँ और चुम्बकीय बल रेखाएँ एक ही क्षेत्र में होती है।

(थॉमसन द्वारा e/m का निर्धारण)

सिद्धांत (Theory) :-

जब इलेक्ट्रॉन पुँज के मार्ग में कोई भी क्षेत्र उपस्थित नहीं होता तो इलेक्ट्रॉन सरल रेखा में चलकर पर्दा SS’ के बिन्दु P पर टकराते हैं।

प्लेटों X और Y के मध्य इलेक्ट्रॉन पुँज की गति के लम्बवत् विद्युत क्षेत्र लगाने पर इलेक्ट्रॉन धन प्लेट की ओर आकर्षित होकर ऊपर की ओर विक्षेपित होते हैं ,

किन्तु जब अकेला चुम्बकीय क्षेत्र लगाया जाता है तो इलेक्ट्रॉन नीचे की ओर विक्षेपित होते हैं।

मानलो इलेक्ट्रॉन पुँज का वेग v तथा प्रत्येक इलेक्ट्रॉन पर आवेश की मात्रा e है।

यदि विद्युत क्षेत्र की तीव्रता E हो , तो विद्युत क्षेत्र के कारण एक इलेक्ट्रॉन पर लगने वाला बल = eE

चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता B हो , तो चुम्बकीय क्षेत्र के कारण उसी इलेक्ट्रॉन पर लगने वाला बल = evB

सूत्र की स्थापना :-

यदि दोनों क्षेत्र एक साथ लगाये जाये तथा उनका समायोजन इस प्रकार किया जाये कि इलेक्ट्रॉन पुँज में कोई विक्षेप न हो, तो

विद्युत क्षेत्र के कारण लगने वाला बल = चुम्बकीय क्षेत्र के कारण लगने वाला बल

eE = evB

v = E /B ….(1)

जब एक इलेक्ट्रॉन कैथोड से ऐनोड की ओर गति करता है , तो उसकी स्थितिज ऊर्जा गतिक ऊर्जा में परिवर्तित होने लगती है।

इस प्रकार कैथोड पर इलेक्ट्रॉन की स्थितिज ऊर्जा ऐनोड पर इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा के बराबर होती है।

यदि ऐनोड और कैथोड के बीच विभवान्तर V हो , तो कैथोड पर इलेक्ट्रॉन की स्थितिज ऊर्जा = eV

चूंकि इलेक्ट्रॉन का वेग v है , ऐनोड पर इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा = 1/2 mv²

1/2 mv² = eV

v² = 2eV / m

या v =√ 2eV / m ……(2)

समीकरण (1) और (2) से ,

E /B = √ 2eV / m

E² /B² = 2eV / m

अतः e/m = E² / 2VB² …(3)

यदि E , B और V के मान ज्ञात हों , तो समीकरण (3) की सहायता से इलेक्ट्रॉन के लिए e/m का मान ज्ञात किया जा सकता है।

जे. जे. थॉमसन ने e/m का मान 1.77 × 10¹¹ कूलॉम / किग्रा निकाला था। वर्तमान में e/m का मान 1.759 × 10¹¹ कूलॉम / किग्रा है।

[नोट :- e/m मान विसर्जन नलिका में ली गई गैस या इलेक्ट्रोडों के पदार्थ पर निर्भर नहीं करता। ]

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Author: educationallof

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