विभेदन क्षमता किसे कहते हैं ?

विभेदन क्षमता (Resolving Power) 

विभेदन क्षमता –

प्रकाशिक यन्त्रों का वर्णन हमने किरण प्रकाशिकी के आधार पर किया है ,

प्रकाश की तरंग प्रकृति की हमने पूर्णतया उपेक्षा कर दी है ,

किन्तु व्यवहार में प्रकाश की तरंग प्रकृति के कारण कई कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं।

यदि एक बिन्दु वस्तु (Point object) का प्रतिबिम्ब एक लेंस द्वारा प्राप्त करें तो बिन्दु वस्तु का तीक्ष्ण बिन्दु प्रतिबिम्ब प्राप्त नहीं होता ,

अपितु धब्बा सा विवर्तन प्रतिरूप प्राप्त होता है।

यह प्रकाश की तरंग प्रकृति के कारण होता है।

पुनः यदि दो बिन्दु वस्तुएँ एक दूसरे के समीप हों तो लेंस द्वारा बने उनके विवर्तन प्रतिरूप (यहाँ लेंस को एक वृत्तीय द्वारक माना जा सकता है )

एक दूसरे के समीप बनेंगे और यदि बिन्दु वस्तुएं एक दूसरे के अत्यंत निकट हैं ,

तो विवर्तन प्रतिरूप एक दूसरे पर अतिव्याप्त (Overlap) हो जायेंगे।

अतः दोनों बिन्दु वस्तुएं अलग अलग दिखाई न देकर एक ही दिखाई देगीं।

अतः लेंस ऐसी स्थिति में उन वस्तुओं में विभेद नहीं कर पाता।

नेत्र की विभेदन क्षमता –

पास पास रखी किन्हीं दो वस्तुओं का अलग अलग दिखाई देना उसके द्वारा नेत्र पर बनाये गये कोण पर निर्भर करता है।

जब वस्तुएं दूर होती है , तो उनके द्वारा नेत्र पर बनाये गये कोण का मान कम होता है।

अतः दूर में पास पास रखी वस्तुएं स्पष्ट रूप से अलग अलग दिखाई नहीं देती।

किन्तु जब वस्तुएं नेत्र के पास होती हैं ,

तो उनके द्वारा नेत्र पर बनाये गये कोण का मान बढ़ जाता है।

अतः वही वस्तुएं स्पष्ट रूप से अलग अलग दिखाई देने लगती है।

नेत्र की विभेदन सीमा –

प्रयोगों द्वारा देखा गया है कि जब दो बिन्दु वस्तुओं या रेखाओं द्वारा नेत्र पर बनाये गये कोण का मान 1′ (एक मिनट) या ( 1/60°) से कम होता है ,

तो वे बिन्दु वस्तुएं या रेखाएं हमें अलग अलग दिखाई नहीं देतीं।

इस कोण को नेत्र की विभेदन सीमा (Limit of Resolution) कहते हैं।

नेत्र की भाँति अन्य प्रकाशिक यन्त्रों की भी पास पास रखी दो वस्तुओं के प्रतिबिम्बों को अलग अलग बनाने की एक सीमा होती है।

दो वस्तुओं के बीच की न्यूनतम दूरी को जबकि वे वस्तुएं किसी प्रकाशिक यन्त्र द्वारा अलग अलग दिखाई दे सके , उसे प्रकाशिक यन्त्र की विभेदन सीमा कहते हैं।

किसी प्रकाशिक यन्त्र की विभेदन सीमा के व्युत्क्रम को उसकी विभेदन क्षमता कहते हैं।

सूत्र के रूप में ,

विभेदन क्षमता = 1/विभेदन सीमा

सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता –

सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता का निर्धारण दो बिन्दुओं के बीच की उस न्यूनतम दूरी से किया जाता है ,

जिससे वे वस्तुएं सूक्ष्मदर्शी से देखे जाने पर अलग अलग दिखाई दे सकें।

ऐबी (Abbe) के अनुसार , सूक्ष्मदर्शी द्वारा विभेदित की जा सकने वाली दो बिन्दुओं के बीच की न्यूनतम दूरी निम्न समीकरण से दी जाती है :

d = λ / 2μ sin θ ………(1)

जहाँ λ वस्तु को प्रकाशित करने के लिए प्रयुक्त प्रकाश का तरंगदैर्घ्य है , θ वस्तु के प्रकाश से शंकु का अर्द्ध कोण है

तथा μ वस्तु और अभिदृश्यक के बीच के माध्यम का अपवर्तनांक है।

सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता

समीकरण (1) से ,

सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता = 2μ sin θ / λ

μ sin θ को सूक्ष्मदर्शी का आंकिक द्वारक (Numerical Aperture ) कहते हैं।

नेत्र के लिए μ sin θ = 0.004 होता है।

उपर्युक्त सूत्र से स्पष्ट है कि सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता अधिक होगी यदि :

1. λ का मान कम अर्थात् वस्तुओं को प्रकाशित करने के लिए प्रयुक्त प्रकाश का तरंगदैर्घ्य कम हो।

जैसे – वस्तुओं को प्रकाशित करने के लिए बैंगनी प्रकाश को प्रयुक्त किया जा सकता है।

2. आंकिक द्वारक μ sin θ का मान अधिक हो अर्थात् μ और θ के मान अधिक हों।

अतः वस्तु को अधिक अपवर्तनांक वाले माध्यम में रखा जाना चाहिये

तथा अर्द्ध द्वारक वस्तु पर बनाये गये कोण का मान अधिक होना चाहिए।

सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता को बढ़ाने के लिए विशेष प्रकार का अभिदृश्यक , जिसे तेल निमज्जन अभिदृश्यक (Oil Immersion Objective) कहते हैं , प्रयुक्त किया जाता है।

इस प्रकार के सूक्ष्मदर्शी में देखी जाने वाली वस्तु को वायु में रखने के बजाय अधिक अपवर्तनांक वाले द्रव में रखा जाता है।

दूरदर्शी की विभेदन क्षमता –

दो दूरस्थ वस्तुओं के , जो दूरदर्शी की सहायता से अलग अलग देखे जा सकते हैं , न्यूनतम कोणीय हटाव (Smallest Angular Separation) के व्युत्पन्न को दूरदर्शी की विभेदन क्षमता कहते हैं।

ऐयरी (Airy) के अनुसार , दूरदर्शी द्वारा विभेदन की जा सकने वाली दूरस्थ वस्तुओं के बीच का न्यूनतम कोणीय हटाव dθ निम्न समीकरण द्वारा दिया जाता है :

dθ = 1.22 λ / d …..(1)

जहाँ λ = प्रकाश का तरंगदैर्घ्य तथा d = अभिदृश्यक का व्यास

समीकरण (1) दूरदर्शी की विभेदन सीमा को व्यक्त करता है।

अतः दूरदर्शी की विभेदन क्षमता = 1/ dθ = d / 1.22 λ. …..(2)

दूरदर्शी की सहायता से दूर की वस्तुओं को देखा जा सकता है।

अतः प्रकाश के तरंगदैर्घ्य पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं हो सकता।

समीकरण (2) के अनुसार , दूरदर्शी की विभेदन क्षमता को अधिक होने के लिए d के मान को अधिक होना चाहिये अर्थात् अभिदृश्यक के व्यास या द्वारक को अधिक होना चाहिये।

दूरदर्शी के अभिदृश्यक के बडे़ होने से एक लाभ यह भी है कि वह दूरदर्शी में अधिक प्रकाश भेजता है , जिससे वस्तु का चमकीला प्रतिबिम्ब बनता है।

तत्थात्मक प्रश्न

प्रश्न 1 . आवर्धक लेंस से देखते समय नेत्र को लेंस के पास ही होना चाहिये। यदि नेत्र को लेंस से दूर रखें तो कोणीय आवर्धन (अर्थात् आवर्धन क्षमता) किस प्रकार प्रभावित होगा ?

उत्तर :- यदि नेत्र आवर्धक लेंस से कुछ दूरी पर है तो वस्तु द्वारा नेत्र पर बनाया गया कोण वस्तु द्वारा लेंस पर बनाये गये कोण से कम होगा।

अतः कोणीय आवर्धन कुछ कम हो जायेगा।

प्रश्न 2 . संयुक्त सूक्ष्मदर्शी से देखते समय उत्तल दृष्टि के लिए नेत्र को नेत्रिका के बिल्कुल पास नहीं रखना चाहिए अपितु नेत्रिका से कुछ दूरी पर रखना चाहिए , क्यों ? नेत्र और नेत्रिका के बीच की दूरी कितनी होनी चाहिए ?

उत्तर :- नेत्रिका में बने अभिदृश्यक के प्रतिबिम्ब को नेत्र वलय (Eye Ring) कहते हैं।

नेत्र वलय की सही स्थिति अभिदृश्यक और नेत्रिका के बीच की दूरी पर तथा नेत्रिका की फोकस दूरी पर निर्भर करती है।

वस्तु से चलने वाली समस्त किरणें अभिदृश्यक से अपवर्तित होने के बाद नेत्र वलय से होकर गुजरती हैं।

अतः नेत्र को नेत्र वलय के पास रखना चाहिए।

नेत्र वलय नेत्रिका से कुछ मिलीमीटर की दूरी पर होती है।

प्रश्न 3. सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी में उच्च आवर्धन क्षमता के साथ साथ पर्याप्त विभेदन क्षमता भी होनी चाहिए , क्यों ?

उत्तर :- आवर्धन क्षमता अधिक होने से वस्तु बड़ी और स्पष्ट दिखाई देती है।

किन्तु यदि विभेदन क्षमता कम है , तो उसकी संरचना स्पष्ट नहीं होगी।

तत्थात्मक प्रश्न 2 –

प्रश्न 4. दूरदर्शी का अभिदृश्यक बड़ा तथा नेत्रिका छोटी होती है। इसके विपरीत , सूक्ष्मदर्शी का अभिदृश्यक छोटा तथा नेत्रिका बड़ी होती है। यदि किसी दूरदर्शी को उलट दें तो क्या वह सूक्ष्मदर्शी की तरह कार्य करेगा ? क्या इसका विपरीत सम्भव है ?

उत्तर :- दूरदर्शी की दोनों लेंसों की फोकस दूरियों में बहुत अधिक अन्तर होता है

जबकि सूक्ष्मदर्शी की दोनों लेंसों की फोकस दूरियों में बहुत कम अन्तर होता है।

अतः दूरदर्शी को उलटने पर वह सूक्ष्मदर्शी की तरह कार्य नहीं करेगा।

ठीक इसी तरह सूक्ष्मदर्शी को उलटने पर वह दूरदर्शी की तरह कार्य नहीं करेगा।

प्रश्न 5. यदि दूरदर्शी से दूर स्थित वस्तु को देखते समय अभिदृश्यक पर मक्खी बैठ जाये तो वस्तु के प्रतिबिम्ब पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

उत्तर :- अभिदृश्यक पर मक्खी बैठ जाने के कारण अभिदृश्यक से गुजरने वाले प्रकाश की मात्रा कम हो जायेगी ,

जिससे प्रतिबिम्ब की तीव्रता कम हो जायेगी ,

किन्तु मक्खी दिखाई नहीं देगी।

प्रश्न 6. आपको एक संयुक्त सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी दिया गया है। आप कैसे पता लगायेंगे कि कौन सा सूक्ष्मदर्शी है और कौन सा दूरदर्शी ?

उत्तर :- अभिदृश्यक को देखकर। संयुक्त सूक्ष्मदर्शी के अभिदृश्यक का द्वारक छोटा और दूरदर्शी के अभिदृश्यक का द्वारक बड़ा होता है।

तत्थात्मक प्रश्न 3 –

प्रश्न 7. खगोलीय दूरदर्शी के अभिदृश्यक के व्यास को दुगुना कर देने पर प्रतिबिम्ब की तीव्रता पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? विभेदन क्षमता किस प्रकार प्रभावित होगी ?

उत्तर – प्रतिबिम्ब की तीव्रता I , अभिदृश्यक के द्वारक के क्षेत्रफल πd²/4के अनुक्रमानुपाती होती है , जहाँ d अभिदृश्यक का व्यास है।

अतः I α πd²/4

या I α d²

या I₁/I₂ = d₁²/d₂²

दिया है : d₂ = 2d₁

उपर्युक्त समीकरण में मान रखने पर ,

I₁/I₂ = (d₁/d₂)² = (1/2)² = 1/4 , I₂ = 4I₁

अर्थात् तीव्रता चार गुनी हो जायेगी।

दूरदर्शी की विभेदन क्षमता R = d / 1.22λ

R α d

या R₁/R₂ = d₁/d₂ = 1/2

R₂ = 2R₁

अतः विभेदन क्षमता दुगुनी हो जायेगी।

प्रश्न 8. फोटोग्राफिक  लेंस का द्वारक छोटा होता है जबकि दूरदर्शी के अभिदृश्यक का द्वारक बहुत बड़ा होता है , क्यों ?

उत्तर – फोटोग्राफिक लेंस का द्वारक छोटा होता है।

इसका कारण यह है कि द्वारक छोटा होने से फोकस की गहराई बढ़ जाती है।

दूरदर्शी के अभिदृश्यक का द्वारक बड़ा होता है। इसके निम्न कारण हैं –

1. द्वारक बड़ा होने से इसकी विभेदन क्षमता बढ़ जाती है।

2. द्वारक बड़ा होने से दूरदर्शी में अधिक प्रकाश प्रवेश करता है ,

जिससे चमकीला प्रतिबिम्ब बनता है।

प्रश्न 9. विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं का चित्र लेने के लिए क्या समंजन करना होता है ?

उत्तर – विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं का चित्र लेने के लिए फोटोग्राफिक लेंस को फिल्म के आगे पीछे चलाते हैं।

उदाहरण के लिए , बहुत दूरस्थ वस्तु का चित्र लेना हो

तो फोटोग्राफिक लेंस और फिल्म के बीच की दूरी को फोटोग्राफिक लेंस की फोकस दूरी के लगभग बराबर होना चाहिए।

यदि वस्तु कम दूरी पर है तो उसका चित्र लेने के लिए फोटोग्राफिक लेंस को फिल्म से दूर हटाया जाता है ,

जिससे वस्तु का स्पष्ट , वास्तविक , उल्टा व छोटा प्रतिबिम्ब फिल्म पर बन जाये।

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लेंसों का संयोजन कैसे होता है ?

संयुक्त लेंस की क्षमता (Power of a Lens)-

समतल दर्पण –

विपथन Aberration –

अवर्णकता Achromatism –

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Author: educationallof

12 thoughts on “विभेदन क्षमता किसे कहते हैं ?

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